मिथिला नगरी भइ निहाल, जनमलीं लली सुकुमारी।
राजा जनक जागल भाग, धन्य सुनयना महतारी॥
बैसाख महीनवा उज्जर नौमी, पुरवा बहल मतवारी।
खेतवा जोतत मिललीं माई, सोनवा देह उजारी॥
सोनवा कलसा मिललीं, रूप देखि मन ललचाईं।
गावेलीं मंगल सखियाँ, हियरा खुसी न समाईं॥
मोतियन चउक पुराय रानी, डोलवा लाली झुलावें।
रुनुक-झुनुक बाजे पैंजनियाँ, मइया सोहर सुनावें॥
बाँटें सुदामा अरु सोन, राजा लुटावें भंडार।
अंगना सोहेली लाली, जइसे चनवा अंजियार॥
देखीं मनोहारी मूरती, मुसुकालीं जनक-दुलारी।
जुग-जुग जियें मोरी लली, बोलेलीं सखी-नरनारी॥
गावेलीं परी सब अकास, झरेला गगन फूलवा।
अवध घराने पतोह जनमीं, मेटेलीं जगत सूलवा॥
साँवर बरन राम जिय बसिहें, बनिहें जग अधार।
सीता जनम निहाल धरती, जय-जय करे संसार॥
- सनातन मुकुंद
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