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Social Media Poetry: ऐसे आमंत्रण ठोकर पर

वायरल काव्य
                
                                                         
                            ऐसे आमंत्रण ठोकर पर
                                                                 
                            
जिनको पाना उपकार लगे
मन को ही नहीं स्वीकार लगे

जिसमें नेह सुगंध नहीं हो
"आना ही है" बंध नहीं हो
जैसे आग्रह हो भिक्षा पर
आना-जाना निज इच्छा पर
कोई  विवशता जिसकी हो तो
स्वीकार हृदय से भी है वो तो
यदि निज हित सिद्ध कराने का
उद्देश्य हो भीड़ जुटाने का

विश्वास नहीं उस ब्रोकर पर
आधार तले आधार लगे
आवाह्न स्वयं लाचार लगे
ऐसे आमंत्रण ठोकर पर

हो धरती का अनुरोध नहीं
बरसें फिर भी यदि मेघ वहीं
यदि जंगल-जंगल बात चले
ले झुंड वहां बारात चले
सामूहिक संकेत अगर हो
उसपर मन आतुर उसपर हो
यदि वाणी न्यौता को तरसे
मन छोड़ के तन निकले घर से

फिर हँस लो ऐसे जोकर पर
मुँह देखा यदि व्यवहार लगे
फिर ये गीता का सार लगे
ऐसे आमंत्रण ठोकर पर

घुसकर चित्र खिंचाने को
क्रम सम्मानों का बढ़ाने को
थे स्वार्थ खिले बागानों से
अनुबंध किए अपमानों से
ज्ञान का है जब कोष नहीं
फिर इसमें किसी का दोष नहीं
अपने ही मूल्य गिराए हैं
ये अवसर स्वयं दे आए हैं

कुछ पाया भी, सब खोकर पर
सम्मिलित होकर बेकार लगे
यदि बिन स्पर्धा  हार लगे
ऐसे आमंत्रण ठोकर पर

साभार: वैभव दुबे की फेसबुक वाल से 

17 घंटे पहले

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