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मैत्री-महोदधि

                
                                                         
                            अचल नींव सा अटल भरोसा, हृदय-कंठ का हार बना।
                                                                 
                            
स्वार्थ-शून्य, पावन-सरिता सा, सच्चा मित्र आधार बना॥

रूपक का ये विमल विभव, प्राणों की पावन धारा है,
विपत्ति के घन-घोर तिमिर में, भोर का उजियारा है।
अहंकार की धूलि झटक कर, जो नत होना सीख गए,
वही नियति की कठिन राह का, विमल बुद्धि का सहारा है॥

नीम की कड़वाहट में जैसे, औषधि का अमृत छिपा,
सत्य-वचन की धार तले ही, स्नेह का स्रोत-वितान छिपा।
चातक जैसे मेघ बरसता, वैसे ही यह रीत सखी,
तुलसी के दल-सा पावन, मित्रता का ओज-वित्त छिपा॥

"क्या छोड़ोगे साथ कभी?" यह प्रश्न नहीं, यह व्यंग्य यहाँ,
जो अग्नि-परीक्षा में तप कर, कुंदन सा निखरे, धन्य यहाँ।
मौन-भाषा में जो संवाद रचे, वह मौन नहीं, यह शब्द नहीं,
अधिकार-समर्पण के बंधन, मुक्ति का महा-पर्व यहाँ॥

हृदय-पटल पर अंकित ये जो, अदृश्य रेखाओं का जाल,
काल न मेटे, भाग्य न जीते, है यह प्रेम का महाकाल।
दो काया में एक प्राण का, जो सूक्ष्म नाद की गूँज सुने,
वही मित्रता का प्रतीक है, वही मुक्ति का सत्य अमर हाल॥
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

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