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मैत्री-महोत्सव : गीत

                
                                                         
                            मैत्री-दीप प्रज्वलित हो फिर, स्नेह-सुधा-संचार बने।
                                                                 
                            
हृदय-हृदय के मध्य विराजित, विश्वासों का हार बने॥

जब जीवन-पथ शूल-वितानित, जब तम घेरे चित्ताकाश,
मित्र बने ध्रुवतारक-ज्योति, दे साहस का दिव्य प्रकाश।
मौन-वेदना के निर्जन में, मधुर सांत्वन-सार बने,
हृदय-हृदय के मध्य विराजित, विश्वासों का हार बने॥

स्वार्थ-धूम से ढके गगन में, निर्मल शशि-प्रभा सम मित्र,
कपट-कुहासे को हर लेता, बनकर सत्य-व्रती चरित्र।
दुःख के दग्ध मरुस्थल में वह, शीतल सुधि-जलधार बने,
हृदय-हृदय के मध्य विराजित, विश्वासों का हार बने॥

नित परिवर्तनशील जगत् में, स्थिर अनुराग-अधिष्ठान,
संकट-सिंधु तरण हेतु वह, अचल साहचर्य-विहान।
आत्मा के गुह्य कपाटों का, सहज विमुक्त द्वार बने,
हृदय-हृदय के मध्य विराजित, विश्वासों का हार बने॥

मैत्री केवल भाव नहीं है, यह जीवन का मौन यज्ञ,
अहं-विलय का पावन साधन, शुभ सहअस्तित्व-व्रत-अभ्युदय।
बूँद-बूँद संवेदना लेकर, करुणा का विस्तार बने,
हृदय-हृदय के मध्य विराजित, विश्वासों का हार बने॥

युग-युग तक अविच्छिन्न रहे यह, पावन स्नेह-संस्कार बने।
मैत्री-दीप प्रज्वलित हो फिर, मानवता का सार बने॥
- सनातन मुकुंद
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2 घंटे पहले

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