दग्ध धरा पर दाह-दिवस की, धधक रही ज्वाला विकराल।
तप्त पवन के तीक्ष्ण शरों से, काँप रही तरुओं की डाल।।
भानु-किरण अंगार बरसती, ज्यों प्रलयंकर का उच्छ्वास।
नौतपा की जठर-अग्नि में, तपे जगत का सकल विलास।।
झुलसी अमराई के उर में, मौन हुई कोयल की तान।
तृषित पथिक की सूनी आँखें, खोज रहीं जल का वरदान।।
लू के लपटित तप्त झकोरे, बरसाते अंगार प्रखर।
दग्ध गगन पर दाह लिख रहा, सूर्य चला पथ पर निष्ठुर।।
कुम्हलाए वन, व्याकुल निर्झर, तप्त हुआ सरिता का गात।
धरती तपस्विनी-सी सहती, सूर्याग्नि के तीखे घात।।
किन्तु इसी संताप-कुंड से, अंकुर पाता नव जीवन।
ताप तपाकर ही गढ़ता है, श्रम-साहस का स्वर्णिम मन।।
दिपदिप करते ज्वलित क्षितिज पर, स्वर्णिम पावक-शाल विशाल।
प्राची के अरुण कपोलों पर, दमके दाहक रक्त गुलाल।।
नौतपा की अग्नि-ज्वाला, ऋतु-चक्रों का सत्य महान।
ताप बिना कब खिल पाता है, जीवन का मधुमास वितान।।
-सनातन मुकुंद
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