द डेंजर टू बी सेनः क्रिएटिविटी एंड द एसेंट्रिक माइंड
लेखिका : रोजा मोंटेरो
प्रकाशक : यूरोपा कंपास
महान लोग थोड़े सनकी क्यों होते हैं
इसी महीने प्रकाशित इस किताब में फ्रांज काफ्का, वर्जीनिया वुल्फ व मार्सेल प्रुस्त की मिसाल देते हुए लेखिका ने मानसिक संघर्षों और रचनात्मकता के संबंधों को खंगाला है। किताब की रोचक सिद्धि है कि असामान्य लोग ही सत्य को समझ और व्यक्त कर पाते हैं।
यह किताब उन विलक्षण, अशांत और तेजोदीप्त मस्तिष्कों के बारे में है, जिन्होंने साहित्य को आकार दिया। यह किताब पागलपन, मृत्यु और आत्महत्या जैसे विषयों का गहराई से विश्लेषण करती है। लेखिका रोजा मोंटेरो का मानना है कि जिसे हम अक्सर ‘विचलन’ या असामान्य व्यवहार कहते हैं, वह कई बार इन्सानी स्वभाव और वास्तविकता को सामान्य व्यवहार से भी अधिक सच्चाई से सामने लाता है।
संस्मरण, निबंध, साहित्यिक विश्लेषण, मनोवैज्ञानिक चिंतन और बौद्धिक जासूसी कहानी के इस साहसी, व्यक्तिगत और गहन शोध पर आधारित मिश्रण में, मोंटेरो ने मनोविज्ञान, तंत्रिका विज्ञान, रचनात्मक साहित्य तथा लेखकों व कलाकारों की गवाहियों व जीवनियों का सहारा लेकर रचनात्मकता और मानसिक अस्थिरता के बीच के जुड़ाव पर एक बेहद दिलचस्प कहानी बुनी है। इस अनोखी पड़ताल में, मोंटेरो रचनात्मकता और पागलपन के बीच के रिश्ते को गहराई से खंगालती हैं।
अपनी बुद्धिमत्ता, उदारता और कहानी कहने की अद्भुत शैली के साथ, मोंटेरो फ्रांज काफ्का, वर्जीनिया वुल्फ, एमिली डिकिंसन, सिल्विया प्लाथ, मार्सेल प्रुस्त, जोसेफ कॉनराड और डोरिस लेसिंग जैसी हस्तियों को जीवंत कर देती हैं। वह एक ऐसा विशाल चित्र उकेरती हैं, जो दर्शाता है कि मस्तिष्क किस तरह काम करता है। लेखिका ध्यान दिलाती हैं कि जोसेफ कॉनराड और फिलिप के डिक जैसे कई लेखकों को बचपन में कोई गहरा सदमा लगा था। वह अनुमान लगाती हैं कि शायद इन्हीं वजहों से कहानीकार समय के गुजरने और मृत्यु के प्रति इतने जुनूनी होते हैं। इसके अलावा, वह लेखकों के बीच मानसिक बीमारी की व्यापकता का पता लगाती हैं, और विश्लेषण करती हैं कि समाजीकरण और तंत्रिका-संबंधी बनावट किस प्रकार रचनात्मकता को प्रभावित करते हैं। वह कलाकारों के नशे की लत वाले स्वभाव की भी पड़ताल करती हैं।
मोंटेरो के सिद्धांत हमेशा से ही दिलचस्प रहे हैं; ठीक वैसे ही, जैसे उनकी वह रोमांचक दास्तान, जिसमें वह एक धोखेबाज का पीछा करती हैं। मोंटेरो बताती हैं कि जब वह 28 साल की थीं, तब उन्हें एक ऐसी महिला के फोन आने लगे, जो बहुत परेशान थी और दावा कर रही थी कि मोंटेरो का उसके बॉयफ्रेंड के साथ संबंध था। लाख कोशिशों के बावजूद उन्हें वह आदमी याद नहीं आया। फिर, आखिरकार मोंटेरो उस महिला से मिल पाईं और उसे समझाने में कामयाब रहीं।
दशकों तक, इसी महिला ने मोंटेरो का रूप धरा, अनजान पाठकों को ऑटोग्राफ दिए और उन विश्वविद्यालयों का दौरा भी किया, जहां मोंटेरो ने काम किया था। इस हमशक्ल की कहानी आज भी जारी है। एक रोचक जासूसी कहानी की तरह, किताब का हर नया संकेत पाठकों को रचनात्मकता की बेहतर समझ और इस सवाल के जवाब के और करीब ले जाता है कि वास्तव में क्या सामान्य है और क्या असामान्य।
कुल मिलाकर, द डेंजर टू बी सेन उन असाधारण लोगों के प्रति एक संवेदनशील और प्रेरणादायक श्रद्धांजलि है, जिनकी सोच व जीवन सामान्य धारणाओं से अलग होते हैं।
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