साधु का कोई निज मन नहीं होता
उसे दूसरों की आवश्यकताओं का आभास होता है
मैं अच्छों के लिए अच्छा हूं
मैं बुरों के लिए भी अच्छा हूं
क्योंकि अच्छाई गुण है
मैं उनमें विश्वास करता हूं जो विश्वासपात्र हैं
मैं उनमें भी विश्वास करता हूं
जो विश्वासपात्र नहीं हैं
क्योंकि श्रद्धा-विश्वास गुण है
साधु संसार के प्रति सुनम्य और संवेदनशील होता है
फिर भी वह भ्रामक प्रतीत होता है
लोग उनके दर्शन करते और उपदेश सुनते हैं
जबकि उसका व्यवहार छोटे बालक के
समान होता है।
साभार - ताओ-ते-छिड.
अनुवाद - वन्दना देवेन्द्र
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