संसार नाट्यालय है विचित्र,
बने यहाँ हैं हम पात्र मित्र!
रिझा सके जो प्रभु का न चित्त,
तो लाभ क्या है अपने निमित्त?
संसार है रात्रि-नभोपमान,
मनुष्य तारा-गण के समान।
प्रकाश जो व्यक्त न नाम का है,
होना हमारा किस काम का है?
कर्तव्यता की कृषि का निकेत,
संसार है एक विशाल खेत।
बोता यहाँ जो जन बीज जैसा,
होता उसे है फल लाभ वैसा॥
संसार है एक गंभीर कूप,
भरा हुआ है जल मोद-रूप।
होगा यहाँ सद्गुण जो न पास,
कहो बुझेगी किस भाँति प्यास?
संसार युद्ध-स्थल है कठोर,
हैं लोभ-मोहादिक शत्रु घोर।
विवेक-रूपी बल जो नहीं है,
तो हार ही हार सभी कहीं है॥
संसार है एक अरण्य-भारी,
हुए जहाँ हैं हम मार्गचारी।
जो कर्म रूपी न कुठार होगा,
तो कौन निष्कंटक पार होगा॥
संसार है एक समुद्र मानों,
इसे महा दुस्तर-दीर्घ जानों।
न धर्म-नौका-अवलंब होगा,
तो डूबने में न विलंब होगा॥
समुक्ति-रूपी फल का विशाल,
संसार है एक रसाल शाल।
अनुन्नतात्मा जन जो यहाँ है,
रक्खी फल-प्राप्ति उसे कहाँ है?
संसार है एक कुटुंब भारी,
है बंधु संपूर्ण शरीरधारी।
देखो, मिटै आपस का न मेल,
बना बनाया बिगड़े न खेल॥
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