नील वसन नभ अविराम।
तारा-मौक्तिक द्युति-आराम।।
रजनी मस्तक हिम-अभिताम।
क्षीर-सिंधु सा उज्ज्वल धाम।।
गगन-सरोवर रजत-विहार।
शीत-सुधा-कण मधु-अभिसार।।
श्वेत-कली सम स्मित-संसार।
चांदनी-धारा नभ-शृंगार।।
चेतन-सुप्त स्मृति-अवलंब।
कल्पना-जाल भाव-अदंभ।।
माया-रूप मधुर-आडंबर।
मानस-पट पर चित्र-स्वयंभ।।
गहन-कृष्ण-वर्ण सुकुमार।
श्याम-सिंधु भाव-विस्तार।।
अंधकार हृदय-का-हार।
रजनी का धवल-आधार।।
ग्रह-गण-चाल नभ-नर्तन।
दीप्ति-पुंज स्वर्ण-वर्तन।।
शून्य-गर्भ मौन-अस्तित्व।
अमृत-बिंदु काल-वर्तन।।
निशि-गहन शांत-गंभीर।
पवन-स्पर्श मलय-समीर।।
शून्य-पथ धवल-धीर।
मौन-भाव अगम-नीर।।
तृण-पृष्ठ हिम-कण-सार।
मोती-छवि शीत-शृंगार।।
मृदु-स्पर्श मंद-प्रसार।
निशा-सुधा नव-उपहार।।
पूर्व-दिश ताम्र-प्रभास।
शशि-मुख क्षीण-उल्लास।।
भोर-राग स्वर्ण-अभ्यास।
रात्रि-अंत नव-प्रकाश।।
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X