चंचल पवन, नीरव नभ में, कौन-सा संदेश लिये,
अदृश्य चरण-चिह्नों की ध्वनि, किस वन-प्रांतर से आये॥
शिशिर-श्वास-सी शीतलता में, प्राणों का संचार लिये,
कोमल स्पर्शों की भाषा में, मूक हृदय का अनुराग लिये।
पर्ण-पर्ण पर नृत्य रचाता, मौन राग-सा बहता है,
अदृश्य रहकर भी जग को, गति का रहस्य कहता है॥
धूल-धूसरित पथ पर चलकर, युग की कथा सुनाता है,
रेत-रेत के सूने गर्भ में, बीज समय के बोता है।
पर्वत के निश्चल गौरव को, क्षण भर में झुकवाता है,
निर्जन वन की नीरवता में, जीवन-गीत जगाता है॥
कभी सुरभि बन मधुवन से, प्रणय-संदेश लाता है,
कभी विरह की दग्ध व्यथा से, अन्तर को दहकाता है।
मेघ-नयन के अश्रु-बिन्दु बन, वर्षा-राग सुनाता है,
नभ का मौन महाकवि बनकर, अनकहा गीत सुनाता है॥
दीप-शिखा की कम्पन में भी, तेरी ही झंकार बसी,
सरिता की चंचल लहरों में, तेरी ही गति-प्यास बसी।
हे पवन! तू केवल वायु नहीं, जीवन का शाश्वत गान,
परिवर्तन के हर स्वर में, गूँज रहा तेरा विधान।।
-सनातन मुकुंद
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