ऋतुराज के स्वागत में, प्रकृति श्रृंगारित आज,
पीत वसन पीतांबरी, बसंत का शुभ आगाज़।
मलयानिल के मृदु स्पर्श से, पुलकित वन-उपवन,
नव रागों में ढल उठी, धरा-गगन की चेतन।
आम्र-मंजरी हँसती बोले, कोयल छेड़े तान,
भृंग-पंख पर थिरक उठा, मधु का मृदुल गान।
कली-कली में रंग जगे, सौरभ के विस्तार,
ऋतु ने ओढ़ा सौंदर्य, माधुर्य का संसार।
पग-पग पर उल्लास बहे, शीतल सुख की धार,
जीवन फिर से सीख रहा, सहज प्रेम-व्यवहार।
स्वर्ण प्रभात झरने लगा, नभ से अनुराग,
पत्तों-पत्तों अंकुरित हुए, ऋतु के संवाद।
वीणा-सी बज उठी धरा, पायल-सी मुस्कान,
ताल में बंधा काल भी, स्वर में ढला विधान।
मन की वीथी महक उठी, छूकर कोमल छंद,
साधना-सा लगने लगा, बसंत-रस आनंद।
लतिका नृत्य में लीन हुई, लय में झूमें डाल,
राग बसंती रंग से, सजा सृजन का ताल।
संयम, सौष्ठव, तेज सब, एक साथ निखरे आज,
कला तपस्या बन गई, जब जागा ऋतुराज।
शब्द, स्वर और मौन भी, एक सूत्र में आए,
जहाँ रस ने मर्यादा ली, वहीं गीत सुहाए।
ऋतु-राज की इस वंदना में, स्वर-रस बहने लगा,
बसंती तान की धारा में, मुकुंद समाने लगा।
- सनातन मुकुंद
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