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श्री जानकी स्तोत्र

                
                                                         
                            नमन श्रेष्ठ जानकी रूप, दिव्य ज्योति अमित अनूप।
                                                                 
                            
कनक आभा सोहे गात, नयन कमल दल मनसात॥ १ ॥

प्राण प्रिय राघव प्रिया, करुणा पूर्ण कोमल हिया।
जनक मान गौरव महान, हरतीं जन दुख सकल जहान॥ २ ॥

त्याग मूर्ति मंगल स्वरूप, सौम्य शांत छवि दिव्य अनूप।
अग्नि शुद्ध पावन मूरत, सुखद दिव्य मनभावन सूरत॥ ३ ॥

धैर्य धारिणी धीर धरी, रावण दर्प दलन ही करी।
धरती सुता सुकुमारी मात, अखिल विश्व पालन विख्यात॥ ४ ॥

ममता मयी सुत संग, भव नैया तारो शुभ अंग।
कष्ट सहे पर धर्म रखा, राम चरण चित राग चखा॥ ५ ॥

सती शिरोमणि निर्मल काय, उपमा रहित अलौकिक माय।
स्वर्ण कांति वरदायिनी मात, तुमसे जग का पावन नात॥ ६ ॥

मुनि वाल्मीकि शरण में आईं, अचल शांति जग में पाईं।
मुक्ति द्वार तुम भक्ति आधार, प्रभु का तुम संबल ही सार॥ ७ ॥

पद कमल में शीश नवाता, विमल भक्ति आशीष चाहता।
प्रेम सहित जो पाठ सुनाए, जानकी कृपा सदा वह पाए॥ ८ ॥
- सनातन मुकुंद
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45 मिनट पहले

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