तजा राम ने जानकी, जनक-सुता सुकुमार।
लोक-वाद हेतु तजा, पावन गृह का द्वार।। (१)
कंटक-पथ-गामी हुईं, नृप-सुता सुख-हीन।
दोष-रहित दंडित हुईं, विधि-विधान आधीन।। (२)
तज प्रासाद-विभूति सब, वल्कल धारि शरीर।
नयन-सजल व्याकुल हृदय, अंतस अमित गंभीर।। (३)
मुनि-आश्रम पावन मिला, शाँति-पूर्ण आवास।
ऋषि-पद्धति अपना लिया, तज लौकिक सब आस।। (४)
दिव्य-वसन परिहार कर, कुश-शय्या अब इष्ट।
मिटा दिया वैराग्य ने, जीवन-ताप अनिष्ट।। (५)
ममता-मूरत बन सहा, घोर प्रसव का ताप।
सुत-मुख देख मिटे तभी, विरह-जली संताप।। (६)
पुत्र-धर्म की ओट में, किया सत्य का शोध।
सहते-सहते आ गया, मन में परम प्रबोध।। (७)
त्याग-अग्नि अब बन गई, पावन तपस-धार।
राम-नाम ही अब बना, जीवन-मूल आधार।। (८)
तप-ज्वाला में जल गई, मोह-पाश की ग्रंथ।
हृदय-कमल में खिल उठा, चिन्मय पावन पंथ।। (९)
विगत-विषाद विदेह अब, ब्रह्म-रूप आधार।
त्याग दिया संताप सब, तज यह जग असार।। (१०)
आचरणों की शुद्धि ही, देती सुख का सार।
संन्यास ही अब बना, भव-सागर से पार।। (११)
देही से विदेही हुईं, परम-हंस का रूप।
मिटा दिया वैराग्य ने, तिमिर-मोह का कूप।। (१२)
शांति-पुंज अब बन गया, वैदेही का भाल।
काट दिया संन्यास ने, भव-बंधन का जाल।। (१३)
मुकुंद शरण सीता-चरण, पाया सत्य-विश्राम।
पूर्ण हुआ वैराग्य अब, जपकर प्रभु का नाम।। (१४)
-सनातन मुकुंद
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