नित नवीन आंधी में हमने अपनी साख बचाई है
पुरबिया के झोंकों ने फिर अचल आस जगाई है
कोलाहल के नए दौर में सादगी से ही प्यार किया
इस विरली थाती को अपनी रचना का उपहार दिया
-शशांक प्रिय मिश्र
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