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काले नाग थे — काले निकले

                
                                                         
                            शायरों जैसा लहजा था, कहती थी झूठ सफ़ाई से,
                                                                 
                            
जैसे कोई कंगन पहनाकर काट ले हाथ कलाई से।

पहनी थी तुलसी की माला, पैरों की ज़ंजीर बनी,
बनती होंगी मोहब्बत से तक़दीर लोगों की, 
उसकी एक शमशीर बनी।

चाहा मैंने कमाऊँ कुछ उसके नाम कर दूँ
तमाम सवाल उसकी तरफ़ से सारे आए

हाथी आए, घोड़े आए, चारों ओर से भाले आए,
जब-जब उसके लबों को चूमा, मेरे मुँह से छाले आए,

आस्तीन में जितने साँप थे, सब उस एक के पाले निकले,
चंदन से लिपटे बैठे थे, काले नाग थे — काले निकले।
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16 घंटे पहले

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