पता था सारे इल्ज़ाम मुझ पर ही लगने वाले हैं
वो अपनी हिफ़ाज़त में दलीलें क्या-क्या देने वाले हैं
सच होता पारदर्शी, लगा, समझ जाएंगे सब यूँ ही
मगर मालूम न था, यहाँ सभी झूठे को ही चाहने वाले हैं
चलो चाहे जितना संभल कर, मगर फिर भी
बड़ी फुर्सत में हैं बैठे, जो ऐब लगाने वाले हैं
राह सच्ची है तो किसी आवाज़ पर, पीछे मुड़ना है व्यर्थ
निरर्थक कहते रहते कुछ भी, जो कहने वाले हैं
टूट कर मत बिखरो, ख़ुद ही संभल जाओ 'श्रेयसी'
यहां कोई नहीं ऐसे, जो तुम्हें संभालने वाले हैं
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X