"मैं ठीक हूँ..." 🥀
हर सवाल पर हँसकर मैंने, बस इतना ही कहा है— "मैं ठीक हूँ..."
जब-जब दिल चुपके से टूटा, तब-तब यही लिखा है— "मैं ठीक हूँ..."
चेहरे पर मुस्कान सजा ली, आँखों को समझा लिया। दर्द ने जब आवाज़ लगाई, ख़ामोशी को अपना लिया।
लोग मिले, बातें भी हुईं, महफ़िलें भी कई बार सजीं। पर दिल के सूने कमरे में, तन्हाई हर रात बसी।
मैंने माँ को हँसते देखा, जो थककर भी सोती नहीं। अपने हिस्से के दुःख सँभाल लेती, पर अपनों से कुछ कहती नहीं।
मैंने पिता को भी देखा है, जो घर का आसमान बने। अपनी ख़्वाहिशें दफ़्न करके, बच्चों के अरमान बने।
मैंने उस दोस्त को भी देखा है, जो सबको हँसना सिखाता है। पर रात की ख़ामोशी में, खुद से नज़र चुराता है।
तब समझा—
दुनिया का सबसे भारी बोझ, शायद दुःख नहीं होता है। सबसे भारी बोझ तो वह है, जो किसी से कहा नहीं जाता है।
कितने चेहरे चलते-फिरते, अपना दर्द छिपाए रहते हैं। कितने दिल मुस्कुराते-मुस्कुराते, अंदर ही अंदर टूटते रहते हैं।
अजीब रिवाज़ है दुनिया का— आँसू दिखें तो बात करे। जो चुप रहकर बिखर रहा हो, उससे कम मुलाक़ात करे।
इसलिए अब जब कोई मुझसे, मेरे हाल का ज़िक्र करे, मैं मुस्कुराकर कह तो दूँ— "हाँ, मैं ठीक हूँ..."
पर दिल धीरे से कहता है—
काश कोई मेरी आँखें पढ़ ले, काश कोई मेरी ख़ामोशी सुन ले। काश कोई बिना वजह आकर, मेरे पास कुछ पल ठहर ले।
न सलाह दे, न कोई फ़ैसला सुनाए। बस चुपचाप मेरे साथ बैठे, और मेरा दर्द अपनाए।
क्योंकि हर इंसान लड़ रहा है, एक ऐसी जंग अकेले में, जिसका ज़िक्र नहीं होता, दुनिया के किसी मेले में।
तो अगर कभी कोई तुम्हें, बेख़बर-सा मुस्कुराता मिले, उसकी हँसी पर मत जाना, शायद कोई दर्द छुपाता मिले।
उससे पूछना—
"सच बताना, कैसे हो?"
हो सकता है, बरसों बाद उसे कोई अपना मिले।
और अगर तुमने किसी टूटे दिल को थोड़ा-सा सहारा दे दिया,
तो समझना, तुमने इंसान होने का फ़र्ज़ निभा दिया।
क्योंकि इस दुनिया का सबसे खूबसूरत रिश्ता वही है,
जहाँ कोई यह न पूछे—
"तुम क्या बनोगे?"
बल्कि धीरे से पूछे—
"तुम सच में ठीक हो?"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X