घर सूना होने के डर से, टुकड़े टुकड़े दिल होने से
अपनी ममता को छिनने से, मां बाप कौनन रोता है।
देख के ले जाने वालों को, अनजाने से इंसानों को,
दिल को दहलाने वालों को, कौन है जो न सहन करता है।
हर मां अपने दिल के टुकड़े को, बचपन से अब तक नजरों से,
दूर नहीं कर पाई है जो, कैसे जुदा कर पाएगी वो।
तनिक भनक तक लग जाने से, किसी के घर पर आ जाने से,
कितनी भी कठोर दिल हो माँ, दिल ही दिल वो रोती है।
मन में खयाल आ जाने से, बिदाई तक को सुन पाने से,
मन अधीर अति हो जाता है, आंसू तक भी खो जाता है।
मन ही मन कईयों दिन तक, आंखों नीर बहा करता है,
मन की बातें किसी से कह के, दिल का बोझ कम करता है।
दिल तो दुखी बहुत होता है, पर ना ज़ाहिर कर पाता है,
ऐसे में दिल कुढ़ता रहता ,न जीता और न मरता है।
छाती से जो लगा के पाला, हर दुख में था उसे संभाला,
आज वही जब दूर हो रही, मन क्यों न ये घबराता है।
हँसते हँसते विदा जो करता, भीतर से वो टूट है जाता,
आशीषों की ओट में छुपकर, हर आँसू वो पी जाता ।
बेटी हो या बेटा अपना, दिल का अंश ही होता है,
दूर भले ही हो जाए वो, रिश्ता कभी न खोता है।
यादों की हर एक लकीर में, उसका बचपन सोता है,
खाली आंगन, सूनी चौखट, हर कोना ही रोता है।
बेटी को दूजा जीवन देना, हर मां बाप का कर्म है,
त्याग और ममता से बढ़कर, मां-बाप का धर्म है।
ईश्वर से बस यही प्रार्थना, सदा सुखी वो रहता हो,
जिसको अपनी जान को सौंपा,वो खुशियों में बहता हो।
अपनी पीड़ा भूल के भी, उसकी राह सजाए वो,
सच्चा मां-बाप भी वही है, खुद मिटकर के मुस्काए जो।
-सूबा लाल "अंजाना"
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