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नारी-जीवन-यात्रा

                
                                                         
                            नवजात बनी जब जग में आई,
                                                                 
                            
नयनों में था नूतन प्रकाश।
रोकर अपनी बात बताती,
ममता ही था उसका निवास॥
शिशु बनी तो हँसी बिखेरी,
हर वस्तु में कौतूहल पाया।
माँ की उँगली थाम-थाम कर,
चलना और गिरना सीखाया॥
कन्या बन आँगन में डोली,
गुड़ियों संग संसार बसाया।
भोले मन ने रंग-बिरंगे,
सपनों का उपवन सजवाया॥
बालिका की उम्र में आकर,
ज्ञान-पिपासा मन में जागी।
पुस्तक, खेल, सखी-सहेली,
जीवन की हर राह सुहागी॥
किशोरी के कोमल मन में,
उमड़े नूतन भाव अनोखे।
कभी हँसी तो कभी उदासी,
भविष्य लगे रंगों से धोखे॥
युवती बन जब जग में उतरी,
आशा के दीपक जलते हैं।
प्रेम, कर्म, संघर्ष, सफलता,
नित नूतन पथ पर चलते हैं॥
अप्रौढ़ा गृह-द्वार सँभाले,
सपनों को आकार बनाती।
अपने हित को पीछे रखकर,
सबके सुख में सुख अपनाती॥
प्रौढ़ा बन अनुभव की गंगा,
शांत प्रवाह-सी बहती है।
जीवन के उतार-चढ़ावों की,
गाथा मन ही मन कहती है॥
वृद्धा होकर स्मृतियों के संग,
बीते युग को फिर दोहराती।
पोते-पोतियों की मुस्कानों में,
अपनी दुनिया पुनः बसाती॥
अतिवृद्धा जब काल-द्वार पर,
जीवन का लेखा पढ़ती है।
क्या खोया और क्या पाया है,
मौन भाव से स्वयं गढ़ती है॥
नवजात से अतिवृद्धा तक,
रूप बदलते जाते हैं।
पर ममता, करुणा और धैर्य,
नारी के संग रह जाते हैं॥
जीवन की यह लंबी यात्रा,
ऋतुओं का परिवर्तन है।
नारी केवल एक व्यक्ति नहीं,
सृष्टि का सतत स्पंदन है॥
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
1 सप्ताह पहले

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