आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

था नहीं द्वार पर कोई अपना वहाँ

                
                                                         
                            था नहीं द्वार पर कोई अपना वहाँ
                                                                 
                            
तो ये किसने वहाँ पर बुलाया हमें
दिल की नगरी वही छोड़ आये थे हम
बाद गलियों ने कितना सताया हमें


हम जहाँ भी गये रात ही रात थी
रौशनी ने हमेशा की चालाकियाँ
ख़ुशबुओं ने किया जब भी श्रृंगार तो
बंद कर दी हवाओं ने सब खिड़कियाँ

रतजगे दो नयन थक चुके ऐसे में
चुपके से चाँद ने भी रुलाया हमें ।।



टूटे घुँगरू उदासी चली बाँधकर
साँस बोझिल हुई मिट न पाई थकन
रात बिरहा की ढलने लगी हौले से
चलते-चलते किया देर तक तब मनन

देवताओं में स्थान दे ना सके
देहरी पर सतत बस जलाया हमें ।।



पतझड़ों ने बहारों के रौंदें महल
गर्म झोंकें हवाओं के कैसे सहें
मरुथलों की तपिश ने पुकारा मगर
ध्यान में अपनी सीमा रखें हम बहें

हम न थे प्यास लेकिन लगे प्यास तो
हर किसी ने समुंदर बताया हमें ।।

- सुकेशिनी 'सरगम'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर