था नहीं द्वार पर कोई अपना वहाँ
तो ये किसने वहाँ पर बुलाया हमें
दिल की नगरी वही छोड़ आये थे हम
बाद गलियों ने कितना सताया हमें
हम जहाँ भी गये रात ही रात थी
रौशनी ने हमेशा की चालाकियाँ
ख़ुशबुओं ने किया जब भी श्रृंगार तो
बंद कर दी हवाओं ने सब खिड़कियाँ
रतजगे दो नयन थक चुके ऐसे में
चुपके से चाँद ने भी रुलाया हमें ।।
टूटे घुँगरू उदासी चली बाँधकर
साँस बोझिल हुई मिट न पाई थकन
रात बिरहा की ढलने लगी हौले से
चलते-चलते किया देर तक तब मनन
देवताओं में स्थान दे ना सके
देहरी पर सतत बस जलाया हमें ।।
पतझड़ों ने बहारों के रौंदें महल
गर्म झोंकें हवाओं के कैसे सहें
मरुथलों की तपिश ने पुकारा मगर
ध्यान में अपनी सीमा रखें हम बहें
हम न थे प्यास लेकिन लगे प्यास तो
हर किसी ने समुंदर बताया हमें ।।
- सुकेशिनी 'सरगम'
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