आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ग़ज़ल — “तेरी आँखें”

                
                                                         
                            तेरी आँखें भी क्या अजीब चीज़ हैं,
                                                                 
                            
बिना बोले हर जज़्बात लिख देती हैं।
कभी समंदर की ठंडी सी लहरें लगती,
कभी जलती हुई रात लिख देती हैं।
मैंने पढ़ना चाहा दिल के अफ़साने,
पर ये आँखें तो पूरी किताब लिख देती हैं।
जब वो रोयी थी तो क़िस्मत काँप गई थी,
तेरी आँखें ग़म को भी इज़्ज़त लिख देती हैं।
और जब मुस्कुराई — तो भगवान भी चौंक उठा,
तेरी आँखें ख़ुशियों की हुकूमत लिख देती हैं।
मुझे बस इतना समझ आया मोहब्बत में —
दिल नहीं, तेरी आँखें फ़ैसला लिख देती हैं।
- सूरज निहाल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
18 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर