तेरी आँखें भी क्या अजीब चीज़ हैं,
बिना बोले हर जज़्बात लिख देती हैं।
कभी समंदर की ठंडी सी लहरें लगती,
कभी जलती हुई रात लिख देती हैं।
मैंने पढ़ना चाहा दिल के अफ़साने,
पर ये आँखें तो पूरी किताब लिख देती हैं।
जब वो रोयी थी तो क़िस्मत काँप गई थी,
तेरी आँखें ग़म को भी इज़्ज़त लिख देती हैं।
और जब मुस्कुराई — तो भगवान भी चौंक उठा,
तेरी आँखें ख़ुशियों की हुकूमत लिख देती हैं।
मुझे बस इतना समझ आया मोहब्बत में —
दिल नहीं, तेरी आँखें फ़ैसला लिख देती हैं।
- सूरज निहाल
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