आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मेरी मोहब्बत के ख़िलाफ़ न बोल

                
                                                         
                            मेरी मोहब्बत के ख़िलाफ़ न बोल,
                                                                 
                            
दिल की किताबों का हिसाब न खोल।
तुझको जो कहना है कह ले मगर,
मेरे जज़्बातों का नकाब न खोल।
तूने जो हँसकर तिरस्कार किया,
उस हँसी में ही था ज़हर का घोल।
तूने कहा — “एकतरफ़ा इश्क़ है ये”,
इश्क़ का कोई तरफ़ा न मोल।
तुझे अहसास हो मेरे मोहब्बत की,
तब समझ आएगी ख़ामोशी के बोल।
हमने तो चाहा बिना शर्तों के मगर,
तूने हर वक़्त गिराया है इसका मोल।
छोड़ दे दुनिया की बातों को सनम,
दिल के यादों की अदालत न खोल।
तू तोहफों में वजह तलाशती रही,
हम निभाते रहे — कि इश्क़ के जज़्बात का यही असूल।
इसलिए कहता हूँ मेरी जान,
मेरी मोहब्बत के ख़िलाफ़ न बोल।
-सूरज निहाल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर