मेरी मोहब्बत के ख़िलाफ़ न बोल,
दिल की किताबों का हिसाब न खोल।
तुझको जो कहना है कह ले मगर,
मेरे जज़्बातों का नकाब न खोल।
तूने जो हँसकर तिरस्कार किया,
उस हँसी में ही था ज़हर का घोल।
तूने कहा — “एकतरफ़ा इश्क़ है ये”,
इश्क़ का कोई तरफ़ा न मोल।
तुझे अहसास हो मेरे मोहब्बत की,
तब समझ आएगी ख़ामोशी के बोल।
हमने तो चाहा बिना शर्तों के मगर,
तूने हर वक़्त गिराया है इसका मोल।
छोड़ दे दुनिया की बातों को सनम,
दिल के यादों की अदालत न खोल।
तू तोहफों में वजह तलाशती रही,
हम निभाते रहे — कि इश्क़ के जज़्बात का यही असूल।
इसलिए कहता हूँ मेरी जान,
मेरी मोहब्बत के ख़िलाफ़ न बोल।
-सूरज निहाल
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