निकल पड़ा लेखक,श्वेत पन्ने स्याह करने।
गुमान था चल पड़ा, स्याह दिन चमकाने।
कोई जिसे कद्र नही,कलम की ताकत में।
दवात उड़ेल गया वो, स्याह होते पन्नों पर।
तब मैं निकल पड़ा, नया विकास लिखने।
किसने कहा ताकत,हुआ करती कलम में।
कलम चली जो, तानाशाही में रोड़ा बनने।
तलवार ने हराया उसे, दिन के उजालों में।
ख़्वाब न आते अब, कि कलम बोल उठे।
स्याह और पसरी हुई, इन अँधेरी रातों में।
बदलने लगे विचार, बंधक इन अंधेरों के।
सुरसा सी घिर आई, आज ये स्याह रातें।
नवल इतिहास, लिखा जाए श्वेत पन्नों पे।
जिसे कोई भी स्याही, स्याह न कर पाए।
बेदाग धवल पन्ने, गवाह उन करतूतों के।
जिसे न कह पाई है, तालों में बंद जबानें।
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