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प्रतिकार उतना विकट हो

                
                                                         
                            डॉक्टर डॉक्टर डॉक्टर जब चिल्लाई।
                                                                 
                            
आज क्यों तुम सड़को पे नजर आई।
आग आई घर तक तभी नजर आई।
क्या इसको उत्सव समझ कर आई।

वो निर्भया ना अभया सब डर में थी।
जंतरमंतर पर आवाज उठी कहाँ थी।
दशक बाद आग में घिरी नजर आई।
क्या कभी बस्ती की आग देख पाई।

दुर्भावना सदा समाज गर्भ में छिपी।
नारी की मूलभूत वजह शोषण रही।
डॉक्टर है या कोई केंद्र मे नारी रही।
समाज में भयाक्रान्ता क्यों नारी थी।

पुरुषप्रधान समाज से टकरा जाना।
उठ हर नारी के संग खड़ी हो जाना।
समाज की नाव में हर छेद है खतरा।
न कहना तुम्हारा नही इससे वास्ता।

हर कोई जीता इसी एक समाज मे।
फिर क्यों हम तुम आपस में बंटती।
उठते जागते वहशियों से टकराती।
हर निर्भया के लिए आवाज उठाती।

खाओ कसम कोई एक शिकार हो।
तब तब प्रतिकार उतना विकट हो।
टूट पड़ना हर बार जहां अन्याय हो।
क्या मजाल कि दरिंदे कैसे जी सके।

-सुरेश गुप्ता
 
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एक घंटा पहले

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