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दास्ताँ-ए-बेगुनाह मुजरिम

                
                                                         
                            जब दावत तेरी थी, कलम पर इख़्तियार तेरा था,
                                                                 
                            
मेरी हयात के हर हर्फ़ पर पूर्ण अधिकार तेरा था।
लिखा तूने ही था मेरी तक़दीर का वो मंज़र सुहाना,
भटकने का इल्ज़ाम फिर क्यों लगा बार-बार मेरा था?
डोर थामी तूने, नचाता भी तू ही है मुझे रंग-रंगीला,
गिराता भी तू है, उठाना भी सरोकार तेरा था।
गुनाह की स्याही अगर तूने ही घोली थी काली-काली,
तो बता ऐ खुदा! ये मुजरिम गुनहगार तेरा था?
मंज़र भी तेरा, कहानी भी तेरी, अंजाम भी तेरा ही था,
फिर सज़ा की इस अदालत में क्यों ये इंतज़ार मेरा था?
-सुरेश
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2 घंटे पहले

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