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जागृति

                
                                                         
                            खूबसूरत है हर पल, बस जीने की ज़रूरत है।
                                                                 
                            

रास्ते भी आपके, मंज़िल भी आपकी—
जैसा चाहो वैसा होगा, बस जाग जाने की ज़रूरत है।

क्यों रुके हो, क्यों ठहरे हो?
उठो, अब आगे बढ़ने की ज़रूरत है।

क्या है, कौन है, कैसा है, क्या सोचेगा—
छोड़ो भी ये सब, अब ये ख्याल बंद करने की ज़रूरत है।

अगर आप उम्मीद करते हैं किसी से किसी चीज़ की,
तो उन उम्मीदों को छोड़ देने की ज़रूरत है।

आपके विचार आपके हैं,
हर बार किसी और से सलाह लेने से बचने की ज़रूरत है।

हर किसी को पता होता है उसे क्या करना है, क्या नहीं,
तो बेवजह परवाह करने की ज़रूरत नहीं है।

आप अपने स्वरूप के खुद ज़िम्मेदार हैं,
तो अपनी गलतियों को सुधारने की ज़रूरत है।

आप जैसा चाहेंगे, वैसा पाएंगे,
बस लगे रहने की ज़रूरत है।

आप भी जीवन में बड़े मुकाम हासिल कर सकते हैं,
बस आलस और डर को कम करने की ज़रूरत है।

बस ऐसे ही हर अनोखे पल को ध्यान में रखते हुए,
बढ़ते रहने की ज़रूरत है।
— तृप्ति दुबे
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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