कित भागता ऐ बन्दे, तेरी साधना यहीं है।
कित कर रहा भ्रमण तू तेरी चेतना यहीं है।
कित मांगता सहारा ईश्वर है साथ तेरे।
माना उदास है पर उल्लास भी तुझी में है!"
-तृप्ति दुबे
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X