जिस दिन से हवा में नमी बढ़ गई।
बेखौफ होकर साँस ऊपर चढ गई।।
किस तरह बताऊँ ख़यालात अपने।
उसकी निगाहों में हमदर्दी बढ़ गई।।
हांफने लगा जिस्म तरबतर के बाद।
किस तरह दिमाग पर गर्मी चढ़ गई।।
एक लम्हा उसके बिना कटता नही।
हाय किस तरह लाचारी और बढ़ गई।।
सब जानकर हँसता है मुकद्दर मेरा।
क्या करूँ उसूल की कीमत बढ़ गई।।
'उपदेश' को पहचानना मुश्किल नही।
मौसमी पाजेब की झनकार बढ़ गई।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
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