मोहब्बत अनमोल सम्हालने का साल रहा।
बस सपने सजाये थे उन्हीं का इंतकाल रहा।।
मुस्कान बिखेरने के पल रहे मलाल के साथ।
कुछ खट्टी-मीठी यादो में डूब जाने का पल रहा।।
जैसी गुजरी थी कई साल मंजर वैसा ही गुजरा।
आशाएं कुछ नई जागी मगर धुन्ध का पल रहा।।
दुनिया को दिखाने में कमी कुछ नही 'उपदेश'।
हकीकत में कुछ करीबी छूटने का साल रहा।।
दुआ करती फिर भी सब ठीक ठाक रहने का।
बदकिस्मती से चंचल मन जाने क्यों बेहाल रहा।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
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