जवानी के जलसे शरारत सी बाते।
लबों पर शिकायत तन्हाई की राते।।
कशिश चाहतों की अधिक सताये।
अब कटती ही नही पहाड़ सी राते।।
जबाँ कहने लगी दीवारों से फ़साना।
तेरे नाम की लगें कमसिन सी बाते।।
ये जर्रा जमीं का हुआ जैसे शबनम।
बरसने सी लगती जवाबी सी बाते।।
नज़र चाहे 'उपदेश' जी भर के देखूँ।
किस्मत में ही नही रसीली सी बाते।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
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