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ख्वाब (प्रेम शायरी)

                
                                                         
                            अरमान और भी थे,
                                                                 
                            
ख्वाब और भी थे,

हमने उन्हें जाने दिया,
जेहन में सवाल और भी थे,

लफ्जों ने बया किया,
जज्बात मगर और भी थे,

मुद्दतों तक तन्हाई थी,
जख्म गहरे और भी थे,

दिन तो हमने गुजार लिया,
अंधेरी रातें और भी थे,
- मुमताज अली हामिद
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एक घंटा पहले

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