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ज़िन्दगी...!!

                
                                                         
                            रफ़ता रफ़ता न मुझको सता ज़िन्दगी।
                                                                 
                            
मैं जियूँ कैसे तुझको..? बता ज़िंदगी।

हादसों में रहा मुब्तला....., हर समय,
एक पल को खुशी कर अता ज़िंदगी..!

मुद्दतें हो गईं........, तुझको' रूठे हुए,
क्या हुई मुझसे आख़िर ख़ता ज़िंदगी?

दर्द, आँसू, तड़प, बेबसी के सिवा......!
मौत का भी तो' दे दे..., पता ज़िंदगी।

बेज़ुबां इक "परिंदा" गिरा..., चीखकर,
अब जला दे मेरी तू...., चिता ज़िंदगी।
-पंकज शर्मा "परिंदा
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18 घंटे पहले

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