होगया हूँ बंजर जमीन जैसा।
मुझे झमझमाती बारिश का तोहफा चाहिए।
मुझमें बाकी नहीं अब कोई हुनर रहा।
खुदा की क़ुर्बत चाहिए।
मुझमें सिर्फ़ नफ़रत की आग है।
लोग कहते हैं मुझे मोहब्बत की प्यास चाहिए।
मुझमें पढ़ाई लिखाई का कोई शौक नहीं।
कहते हैं स्कूल जाना चाहिए।
होगया हूँ मैं बोहोत मजबूर।
थोड़ा मजबूर तो इस दुनियां में होना भी चाहिए।
मैं जलता हूँ सबसे।
थोड़ा प्यार का पानी मुझ पर भी बरसना चाहिए।
और ये कविता यूँही नहीं लिखी गई।
मुझमें खामियां हैं बोहोत।
कहीं पर तो इनका इज़हार होना भी चाहिए।
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