आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सफ़र सफ़र

                
                                                         
                            मैं जब भी जिंदगी के सफ़र को देखता हूँ,
                                                                 
                            
खुद को देखता हूँ, फिर असर को देखता हूँ।

किसी की मुझमें बसर करती है हँसी,और
उस पर अपने होंठों के सब्र को देखता हूँ।

आ चुका है बहुत अंदर तक वह मेरे घर में,
इस पर भी मैं खुद को सफ़र में देखता हूँ।

वह अच्छा है, और अच्छों-अच्छों से भी बहुत अच्छा है,
न जाने क्यों इस अच्छाई से मैं खुद को बेख़बर देखता हूँ।
- विष्णु नेह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
26 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर