माना कि दूर हो तुम,
पर हवा में है मेरी
मौजूदगी का अहसास,
तुम भूलना चाहोगे पर
मैं याद आऊंगी
भोर की पहली किरण संग,
भेज दूंगी ओस भीगे अहसास,
और तेरी देहरी पर
अपनी धड़कनों का दिया रख दूँगी,
साँझ की पहली बेला में
तेरे नाम की ख़ुशबू बिखेर दूँगी।
जब धूप तेरे चेहरे को छुए,
तो समझ लेना —
मैं ही हूँ,
तेरी पलकों के साये में ठहरी हुई।
जब रात चाँदनियाँ ओढ़े,
तो जान लेना —
मैं ही हूँ,
तेरे ख़्वाबों के आँगन में टहलती हुई।
कभी चांद तारों-सा
तेरे आसमान में चमक उठूँगी,
कभी रातरानी की ख़ुशबू बन
तेरी साँसों में घुल जाऊँगी।
एक टूटता तारा गुजरे
तो समझना
मैं मांग रही हूं तुम्हे,
हाँ, ख़्वाबों में ही सही —
मैं तुझसे मिलूँगी,
बार-बार,
हर बार।
तेरी ही —
पर अजनबी-सी अपनी।
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