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तुम्हारी चाहतों पे हक़ क्यों हमारा नहीं होता

                
                                                         
                            “तुम्हारी चाहतों पे हक़ क्यों हमारा नहीं होता”
                                                                 
                            

कोई तुम्हें चाहे, उफ्फ ! गवारा नहीं होता,
तुम किसी को देख मुस्कुरा दो —
तो भी अच्छा नहीं लगता।
इस दिल का कसूर कि ये तुम्हारा है,
पर तुम्हें कितना भी चाह लें,
तुम्हारी चाहतों पे हक़
क्यों हमारा नहीं होता।

कोई नज़रों के सामने से,
पल में चुरा ले गया तुम्हें,
और हमारी शिद्दत का
तुम्हें अंदाज़ा ही नहीं होता।
हमने हर दुआ को तेरे नाम से सींचा है हमने
फिर भी तेरे दिल में, मेरा आशियाना नहीं होता।
तेरे होने का सुरूर, मुझ में अभी बाकी है,
तुझ को अब मेरी परवाह भी नहीं हैं,
दिल समझता ही नहीं, कि हर चाहत का अंज़ाम पाना नहीं होता।
- नीरू जैन
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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