कितनी सुंदर जोड़ी है ना —
करवा चौथ और प्रेम
करवा चौथ सिर्फ़ एक व्रत नहीं,
ये मेरे प्रेम मेरे समर्पण का
इक उत्सव है,
जहाँ चाँद गवाह बनता है
उस बेपनाह प्यार का,
जिसे शब्दों में पिरोने की कहां ज़रूरत
बस नज़र की भाषा पढ़ लेना मेरे जन्मों के साथी।
तेरे प्रेम में वैसे तो
हर रोज़ संवार लेती ख़ुद को
पर करवा चौथ के श्रृंगार में
वो सिंदूर ज़रा और चमकता है,
वो बिंदी ज़रा और खिल उठती है,
वो पायल की छनक इक संगीत घुल जाता हैं।
ऐसे में जब तुम इक टक निहारते,
और वो नज़रों में छलकता स्नेह —
मानो चाँदनी के नूर सा
मेरे चेहरे पर उतर आता हैं।
करवा चौथ इक प्रार्थना हैं,
दो आत्माओं का मौन संवाद, और
प्रेम का अनुबंध जो
विश्वास की डोर में इक दूजे को बांधे रखता।
जब वो करवा चौथ की चाँदनी रात,
पूजा की थाली में सजे दीये की लौ में,
नज़र तेरे चेहरे पर पड़ती है,
तो लगता है जैसे समय ठहर गया हो,
सांसें सिर्फ़ उसके नाम से चलती हों,
और दिल की हर धड़कन कहती हो —
“तुझ से मेरा हर दिन करवा चौथ है…”
तेरा चेहरा यूं झिलमिलाता है —
कि हर बार जल अर्पण करते हुए
मन कह उठता है —
प्रेम अगर सच्चा हो,
तो वो जन्मों जन्म साथ निभाता है।
- नीरू जैन
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X