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ख़ुद की कदर कीजिए

                
                                                         
                            ख़ुद की कदर कीजिए...
                                                                 
                            
यह कविता उन सभी लोगों के लिए है, जो:
घर–परिवार, काम और दूसरों की उम्मीदों में इतना खो जाते हैं कि अपनी सेहत और ख़ुशी भूल जाते हैं।
हमेशा दूसरों को खुश करने के लिए जीते हैं, लेकिन ख़ुद के लिए समय और सुकून नहीं निकालते।
"ख़ुद से मोहब्बत" को भुला बैठते है.......
कविता
दुनिया की दो तारीफ़ के बोलों के लिए
ख़ुद की सेहत दाँव पर मत लगाइए,
जितना ख़ुद को पाया नहीं —
उससे बढ़कर
ख़ुद को मत गँवाइए।
घर की सफ़ाई में 24 घंटे लगा
अपनी साँसों को मत घोलिए,
किसी और की चमक दिखाने के लिए
अपने चेहरे की रंगत मत भूलिए।
बे-वजह के ख़यालों में
रातें जाग-जागकर मत काटिए,
बेचैनियों के संग
अपनी नींदें मत बाँटिए।
फ़ुर्सत का इतवार है,
ज़रा चैन से सोइए,
इक दिन सूरज के बाद जागने पर
इतना मत रोइए।
अपने दिल को भी सुनिए,
अपने लिए गुनगुनाइए,
इतनी ख़ुद से सख़्ती अच्छी नहीं —
थोड़ा सा मुस्कुराकर
ख़ुद को भी प्यार से गले लगाइए।
इक कप चाय संग, दिल में बसे
पुराने किस्सों का अखबार बांचिये,
कभी तो फुर्सत के पलों से
जी भर मुलाक़ात कीजिए।
आप भी किसी की दुनिया बाद में हैं,
सबसे पहले अपनी हैं।
तो...
ख़ुद का भी ख़याल रखिए,
ख़ुद की कदर कीजिए....
-नीरू जैन
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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