मैं वो प्रेम स्वप्न हूँ, जिससे तुम मिले ही नहीं,
गैलेक्सियों की गोद में छुपी थी,
जहाँ तुम्हारी दृष्टि पड़ी नहीं।
मेरी आंखों के सागरों और
तुम्हारे रजत- मन के बीच,
प्रश्नों की धारा बहती, तुम बस मौन
उत्तरों के एक सेतु की
संभावना तुमने देखी ही नहीं।
मैं शब्दों की भाषा से
तुम्हें बतलाना नहीं चाहती
कि प्रेम बस प्रेम
बहुत प्रेम हैं तुमसे,
धूमकेतुओं की नीरवता में
गूंजते मेरे प्रेम गीत,
पर पुकार तुमने सुनी ही नहीं।
जब तुम्हारा हृदय आकाश की ओर निहारेगा,
चांद मेरी लिखीं, प्रेम पाती पढ़ सुनाएगा
तो जान लेना
कहीं कोई और हृदय भी तुम्हें निहारता है,
और तुम्हारी उत्तर की प्रतिक्षा में
, ये नज़रे चांद से हटती ही नहीं।
-नीरू जैन
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