सबने कहा —
स्त्री मन की व्यथा को कोई नहीं समझता,
पर क्या कभी किसी ने पुरुष की चुप्पी को पढ़ा है?
वो चुप रहता है, क्योंकि समाज ने सिखाया —
“मजबूत बनो, मत रोओ, सहो और चलो।”
उसके भीतर भी आँधियाँ उठती हैं,
पर वो मुस्कुराहट ओढ़ लेता है,
घर परिवार के बीच अपनी दुखों को
हँसी में छिपा देता है।
वो भी चाहता है — कोई सुन ले
उसकी टूटी उम्मीदों का संगीत,
पर हर बार उसकी भावनाएँ
कर्तव्य के नीचे दब जाती हैं।
वो भी इंसान है, देवता नहीं,
उसके भी सपने हैं, डर हैं,
अधूरेपन की लकीरें हैं।
पर जब कोई कहता है —
“पुरुष तो हमेशा कारण है दर्द का,”
वो चुप रह जाता है, क्योंकि
उसकी सफ़ाई भी स्वार्थ लगती है।
पुरुष और स्त्री दो नहीं, एक हैं —
एक की साँस, दूसरे की धड़कन,
एक की थकान, दूसरे का सहारा।
अगर कोई एक टूटे, तो दूसरा भी बिखर जाता है।
शक्ति तभी पूरी होती है
जब संवेदना दोनों तरफ़ बहती है।खुशी के फूल खिलेंगे
ना वो श्रेष्ठ, ना ये कमतर —
दोनों साथ हों, तभी सृष्टि संपूर्ण है।
- नीरू जैन
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