आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पुरुष मन

                
                                                         
                            सबने कहा —
                                                                 
                            
स्त्री मन की व्यथा को कोई नहीं समझता,
पर क्या कभी किसी ने पुरुष की चुप्पी को पढ़ा है?
वो चुप रहता है, क्योंकि समाज ने सिखाया —
“मजबूत बनो, मत रोओ, सहो और चलो।”

उसके भीतर भी आँधियाँ उठती हैं,
पर वो मुस्कुराहट ओढ़ लेता है,
घर परिवार के बीच अपनी दुखों को
हँसी में छिपा देता है।

वो भी चाहता है — कोई सुन ले
उसकी टूटी उम्मीदों का संगीत,
पर हर बार उसकी भावनाएँ
कर्तव्य के नीचे दब जाती हैं।

वो भी इंसान है, देवता नहीं,
उसके भी सपने हैं, डर हैं,

अधूरेपन की लकीरें हैं।
पर जब कोई कहता है —
“पुरुष तो हमेशा कारण है दर्द का,”
वो चुप रह जाता है, क्योंकि
उसकी सफ़ाई भी स्वार्थ लगती है।

पुरुष और स्त्री दो नहीं, एक हैं —
एक की साँस, दूसरे की धड़कन,
एक की थकान, दूसरे का सहारा।
अगर कोई एक टूटे, तो दूसरा भी बिखर जाता है।

शक्ति तभी पूरी होती है
जब संवेदना दोनों तरफ़ बहती है।खुशी के फूल खिलेंगे
ना वो श्रेष्ठ, ना ये कमतर —
दोनों साथ हों, तभी सृष्टि संपूर्ण है।
- नीरू जैन
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर