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नए दौर में

                
                                                         
                            करते है कर्म बुरे खुद
                                                                 
                            
पर दूसरों पे खार खाते है,
जब लोग खुद से ही ख़ुद हार जाते हैं।
महल मालिये हैं तगड़े,
और गुरूर भी ऊंचे उनके, पर
तरस आता है उनकी अमीरी पे
जो ग़रीबों की रोजी रोटी मार जाते है,
तनख्वाह चाहे कितनी भी मोटी
पर घुस लेने से कहां बाज आते है,
छीन कर मेहनत की कमाई किसी की
जाने कैसे चैन पाते हैं।
चाहे तकलीफ हो कितनी भी,
इस दौर में मशवरा न मांगो किसी से
आपकी भलाई के बहाने लोग,
अपना उल्लू साध जाते है।
मतबल निकलने पे
पहचानने से भी इंकार कर दे, तो
कोई बड़ी बात नहीं,
गले लगाते भी ऐसे लोग तो
पीठ में छुरा उतार जाते है।
करते है कर्म बुरे खुद
पर दूसरों पे खार खाते है.....
- नीरू जैन
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एक घंटा पहले

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