तुम में घुलने मिलने लगी हूं,
तुम्हारे अहसास के धागो में
प्रेम मोती पिरोने लगी हूँ,
ना मन मीरा ना मैं राधा,
बस तेरी बांसुरी की धुन सी हो चली हूँ,
नाम कोई दूजा सूझता नही,
मन के मनके पे, तेरे नाम की माला फेरने लगी हूँ।
हवाएं भी छेड़ जाती लेकर नाम तेरा,
फूलों की डाली सा थिरकने लगी हूँ।
नज़रों ने कर डाले नज़ारें फिके सारे,
तेरी सूरत नज़रों में लिए फिरती हूँ।
दिवानगी में करने लगी
सिर्फ़ तेरी परस्ती यूं, कि
ख़ुद से भी बेखबर रहने लगी हूँ।
या रब लग जाए मेरी उमर तुम को,
तुम पे मैं मरने मिटने लगी हूँ।
- नीरू जैन
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