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तुम्हे लगता है

                
                                                         
                            निराशा में भी आशा के द्वार ढूंढ लेंगे,
                                                                 
                            
तुम अंधेरा करोगे,
हम आशाओं के नए ख़्वाब बुन लेंगे
तुम्हे लगता ना,
कि न हमारी हस्ती कोई ,
न कोई पहचान,
पर इक दिन ऐसा आयेगा,
आप ख़ुद हमे ढूंढा करेंगे। डॉ नीरू जैन
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
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