कभी, मेलों के शहर के वीराने भी देख।
गर हो सके,तो प्यासे मयखाने भी देख।।
नये जख़्मों की दवा देने वाले , चारागर।
फुर्सत मिले,तो ये जख़्म पुराने भी देख।।
गुल-ओ-बू के साथ रहने वाले , बागबां।
कुछ देर को, खिंजा के जमाने भी देख।।
काश,कोई अमीर-ए-शहर से ये कह दे।
ठहर कर, तू गरीब के ठिकाने भी देख।।
फकत,अपने ही दर्द की बात करते हो।
सुनकर, मेरे ये दुख-भरे तराने भी देख।।
जो जाम-ए-आब-ए-चश्म, पीते हैं रोज।
आज मयकशी के ऐसे दीवाने भी देख।।
रहबरी के नाम पे जो गुमराह किये गये।
राह-ए-हयात मे, ऐसे अनजाने भी देख।।
हमने माना, कि बहुत तीरंदाज हो तुम।
मगर, कभी अपने के निशाने भी देख।।
-यूनुस खान
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