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जॉन एलिया: उर्दू शायरी का यह देवदास जब ख्याली प्रेमिका सोफिया में ही खोने लगा...

जॉन एलिया
                
                                                         
                            जॉन एलिया पाकिस्तान के अलावा हिंदुस्तान और पूरी दुनिया में बड़ी अदब के साथ पढ़े जाते हैं। इनका जन्म 14 दिसंबर 1931 को उत्तर प्रदेश के अमरोहा में हुआ था। आज के शायरों में इन्हें काफी दिल से पढ़ा जाता है। लोग इन्हें एक खाटी दिलजला शायर मानते हैं। इनकी जिंदगी के तंबू के दो बंबू थे। शराब और शायरी। एक में शुरू होते तो दूसरे में खतम हो जाते। शायद, यानी और गुमान इनके काव्य संग्रह हैं। जिनमें मोहब्बत को कई अंदाज में पेश किया गया है। 
                                                                 
                            

आख़िरी बार आह कर ली है 
मैंने ख़ुद से निबाह कर ली है 

अपने सर इक बला तो लेनी थी 
मैंने वो ज़ुल्फ़ अपने सर ली है 

दिन भला किस तरह गुज़ारोगे 
वस्ल की शब भी अब गुज़र ली है 

जाँ-निसारों पे वार क्या करना 
मैंने बस हाथ में सिपर ली है 

जो भी माँगो उधार दूँगा मैं 
उस गली में दुकान कर ली है 

मेरा कश्कोल कब से ख़ाली था 
मैंने इस में शराब भर ली है 

और तो कुछ नहीं किया मैं ने 
अपनी हालत तबाह कर ली है 

शैख़ आया था मोहतसिब को लिए 
मैंने भी उन की वो ख़बर ली है 

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जॉन एलिया ने अमरोहा को हमेशा अपने जेहन में याद रखा।

एक वर्ष पहले

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