आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हमारे सामने से गुज़रे चंद्रकांत देवताले ऐसे

चंद्रकांत देवताले
                
                                                         
                            पृथ्वी के साथ जुड़े खून के इतिहास को 
                                                                 
                            
पोछते हुये अब मैं बसंत कहना चाहता हूँ 
बसंत जो मेरी पृथ्वी की आँख है 
जिससे वह सपने देखती है 
मैं पृथ्वी का देखा हुआ सपना कहना चाहता हूँ 
यही सपना मुझमें कविताएं उगाता है


हमारे दौर का सचमुच एक बड़ा कवि, अद्भुत संवेदना का स्रोत और ज़िन्दगी का जानकार हमारे बीच से चला गया। ऐसा कवि होना वाकई कठिन होता है जो प्रेम के लिए, मनुष्यता के लिए आज़ादी और जनतंत्र के लिए, स्त्रियों, दलितों, ग़रीबों के साथ संघर्ष में शामिल और हमेशा समर्पित होता रहा है। कविता उसकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा गहना था। वह अकविता के शोरगुल के बीच से आया था। लगभग चाकुओं जैसे शब्दों का इस्तेमाल करता था। हड्डियों में छिपे ज्वर को पहचानता था। वह लिखता ही तो रहा जीवन भर। लिखना ही उसकी आत्मा का असली ताप था।

वह दीवारों पर खून से लिखता हुआ रोशनी के मैदान की तरफ गया। इतनी पत्थर रोशनी में आम आवाम के सपने देखता रहा। वह जानता था कि आग हर चीज़ में विद्यमान है। देखना समझना, महसूस करना उसकी ज़िन्दगी का यथार्थ था। उसने तपते हुये भूखण्ड को देखा। वह ग़लत लोगों और ख़राब व्यवस्था पर पत्थर फेंकता रहा क्योंकि उसमें विडम्बनाओं को देखने पहचानने की भरपूर ताक़त थी। मुझे लगता है उसे कविता सिद्ध थी। जिसे छू देता वह कविता की शक्ल में ढल जाता। उसकी कविता का यह अंश पढ़ें- 

"मैं बंधा हूँ कविता की रस्सी 
और धरती के खूंटे से 
इसीलिये आजाद हूँ इतना 
सपने देखने के लिए करते संघर्ष 
अपने को भरसक बचा रहा 
ताकि डोंडी पीटता रहूं अंतिम साँस तक 
...और कविता जिसे 
पता नहीं किस भरोसे बना लिया 
पड़ताल के लिए कसौटी मैंने 
क्या उसका भी करवाना होगा नार्को टेस्ट।" 


कविता देवताले जी की सबसे बड़ी संजीवनी थी। उसने हंसते हुए लकड़बग्घों को पहचानते हुये उन पर भरपूर रोशनी डाली। उनका विषैलापन देखा, उसकी हक़ीक़त बयान की। उसने उजाड़ में भी मनुष्यता के विकास का संग्रहालय खोजा। वह न तो कभी थका न कभी रुका। काम करते हुए भी निरन्तर लिखते रहना यह उसके ही बूते की बात थी। 

एक वाकया याद आता है मैं लोकसेवा आयोग की उत्तरपुस्तिकाओं के मूल्यांकन करने हेतु इन्दौर गया हुआ था। तय हुआ कि देवताले जी से मिलना है। मैं पुत्रवत उपेन्द्र शर्मा के यहाँ ठहरा हुआ था। शायद आयोग कार्यालय मुझे 11 बजे दिन पहुँचना था। भाभी श्रीमती देवताले अपनी ड्यूटी पर बाहर थीं। बेटी भी नहीं थी। काम वाली बाई काम करके जा चुकी थी। समय सम्भवतः 10 बजे दिन का था। देवताले जी से फोन पर बातें पहले ही हो चुकी थी। घर में अकेले थे। मैंने सोचा था आधे पौन घण्टे बातें होंगी फिर वहीं से आयोग जाऊँगा। देवताले बहुत प्यारे आदमी थे बिना कुछ खाना खिलाये हुये मुझे जाने नहीं देना चाहते थे। अपने हाथों कुछ बनाया और खिलाया। बातें तो ऐसी हो रहीं थी ऐसे लगता जैसे कभी ख़त्म नहीं होंगी। प्यार, इज़हार आत्मीयता तो उनकी फ़ितरत थी। जितने लोग संपर्क में आते प्रायः उन सबके निकट हो जाते। क्योंकि कोई औपचारिकता उनके यहाँ नहीं होती थी। वे मुझे हमेशा प्रेम और अपनत्व की ऊष्मा से भरे लगे। 

चन्द्रकान्त देवताले मुडभेड़ करने वाले कवि हैं। वे बच-बचाकर निकलना नहीं जानते और न निकलने की चाहत रखते। वे अपने आप को छिपाते नहीं। उनके अंदर लद्धड़पने के लिये कोई जगह नहीं। वे अपने समय और समाज पर चौकन्ने हैं। वे वक़्त के आरपार देखते हैं और अपने समय में बिंधी हुई बेचैनियों की बहुत शिद्दत से पड़ताल करते हैं। जैसे एक जगह उन्होंने लिखा- 

"यह वक़्त, वक़्त नहीं 
एक मुक़दमा है या तो गवाही दो 
या हो जाओ गूंगे 
हमेशा-हमेशा के वास्ते।" 


अपने समय और समाज की वे गहराई से पड़ताल करते हैं। उन वास्तविकताओं को खोजते हैं जो आदमी को बेबस बनाती है। वे अपने सच को कहीं भी छिपाते नहीं। जैसे- 

"होगा जो कवि 
वही तो कहेगा 
खटाक से खुलते चाकू की तरह।"

देवताले की संवेदनशीलता गज़ब थी

उनका यह मिज़ाज, उनकी यह अक्खड़ता ताज़िन्दगी बनी रही इसीलिये उनमें हमेशा ताज़गी और रोशन ख़्याल रहे हैं। वे नये-नये लिखने वालों की पातों में हमेशा शामिल रहे क्योंकि उनमें कभी भी न तो पुरानापन आया न ही बासीपना। उनकी कविताओं में एक हरहराता हुआ समुद्र हमेशा रहा है। वे ऐसे-वैसे नहीं लिखते जब भी लिखते हैं बहुत विश्वास के साथ गहन संवेदना और वास्तविकता के साथ- 

“यह रही मेरी नापसंदगी की सूची 
शामिल इसी में मेरे दुश्मन 
गोश्त, चापलूसी करने वाले केंचुए 
घटिया किताबें 
आत्मा या सार्वजनिक फसलों के चोर 
तस्कर, धंधेबाज, ईश्वर, भूख या बेबसी के 
आत्मा ने जिनको कभी नहीं धिक्कारा।” 


वे अपना आत्मालोचन हमेशा करते हैं। उनका विश्वास जैसे एक भारी भरकम दृढ़ चट्टान की तरह है। जैसे- 

“मैं शामिल नहीं हूँ उनमें 
जो रास्ते दिखाने का दम तो भरते हैं 
किन्तु उन रास्तों पर कभी ख़ुद नहीं दिखते 
मुसीबत के दिनों की जो पैदाइश हैं 
मैं मुरीद हूँ उनका।” 


उनके न रहने के बाद उनकी याद बार-बार आती है। आज 15 अगस्त, 2017 को रह-रहकर चन्द्रकान्त देवताले मुझे स्मरण आ रहे हैं। इधर 15-20 दिन से मेरे फोन लगाने के बाद भी उनसे बात नहीं हो पा रही थी। अन्यथा पाँच-सात दिनों में मेरा मोबाइल बज ही उठता था। हालांकि उनकी आवाज़ धीमी पड़ गई थी। जब दो वर्ष पूर्व यानी 13 मई, 2015 को मैं मौत के शिकंजे में था हालांकि यह कहने सुनने की बातें नहीं है। जीवन में सब घटता रहता है। परिवार और दुनिया के बड़े परिवारवालों, शुभचिन्तकों और मेरे अपने लोगाों ने मुझे बचाया तब मैं अचेत था। होश तो बाद में आया और तब से मैं ज़िन्दगी का सरगम सुन रहा हूँ। कौन-कौन लोग, कैसे-कैसे लोग और किन-किन स्थितियों से हमसे जुदा हुये। हम उनकी निरन्तर याद करते हैं।

क्या बताऊँ मेरी आत्मा में मरने वाले असंख्य बच्चों की चीख़ें गूँज रही है। स्त्रियों और बच्चियों के चीत्कार दहाड़ रहे हैं, वो स्त्रियाँ और बच्चियाँ जो निरन्तर ज़ुल्म सहती हैं लेकिन ये तो वो हैं जो बलात्कारों में ज़िन्दा दफ़न की गयी हैं। असहाय बूढ़े तिल-तिल कर मरे। कितने अन्नदाता कर्ज़ में डूबे और आत्महत्याओं की तरफ़ ढकेले गये। यही नहीं कितने लोग निरन्तर दमन भट्टी में और मौत की आग में भूने जा रहे हैं। कितने हैं जिनकी कोई शिनाख़्त नहीं करता। पूरे जंगल, प्रकृति के घरौंदे और कितने ग़रीब, गुरबे निरन्तर दमन में पीसे जा रहे हैं।

देवताले की संवेदनशीलता गज़ब थी। उनकी कवितायें इन्हीं प्रश्नों को लगातार उठातीं हैं। संघर्ष का एक रास्ता तैयार करती हैं। सचमुच हम एक ऐसे समय में सफ़र कर रहे हैं जहाँ उद्घोषणायें और फरमानों का लम्बा सिलसिला है। आज चन्द्रकान्त देवताले नहीं हैं लेकिन उनकी कवितायें तो हैं। उनकी गूँजती लटपटाती आवाज़ तो है। अंधेरे की दुनिया में उनकी आस्थाओं आशाओं की कर्मठता तो है। जिसमें ढली हैं उनकी कवितायें। वे अपनी कविताओं में हमेशा जीवित और जीवन्त रहेंगे। उनकी आवाज़ों के साये हैं। उनकी कविताओं के बुलबुले हैं और उनकी कविताओं के जलजले भी हैं। जब वे लिखते हैं- 

"आवाज़ भी रस्सी है 
जब अकेलेपन की 
सजा काटता पड़ा रहता हूँ 
बाल्टी की तरह सूखे कुयें में 
मेरे दिल अज़ीज़ तुम्हारी आवाज़ 
मैं इत्मीनान के साथ 
खींचती है ऊपर तो 
थरथराने लगता हूँ 
आत्मीयता की बौछार 
और जज़्बातों की धूप हवा में।"
आगे पढ़ें

देवताले की संवेदनशीलता गज़ब थी

एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर