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दाग़ तो मुन्नीबाई के हुस्न पर कुर्बान थे, लेकिन मुन्नीबाई की नज़र इन पर मेहरबान थी

दाग़
                
                                                         
                            मशहूर शायर दाग़ देहलवी जितने शायराना थे उतने ही आशिकाना भी। मुन्नीबाई हिजाब नाम की गायिका-तवायफ से दाग़ के इश्क़ का किस्सा मशहूर है। दाग़ का यह इश्क़ आशिक़ाना कम था शायराना आधिक। हुआ यूं था कि दाग़ उस वक्त आधी सदी से अधिक उम्र जी चुके थे, जबकि मुन्नीबाई हर महफिल में जान-ए- महफिल होने का जश्न मना रही थी।
                                                                 
                            

अपने इस इश्क़ को उन्होंने 'फ़रयादे दाग़' में मजे के साथ दोहराया है। मुन्नीबाई से दाग़ का यह लगाव जहां रंगीन था वहीं थोड़ा संगीन भी था। दाग़ उनके हुस्न पर कुर्बान थे और वह नवाब रामपुर के छोटे भाई हैदरअली की दौलत पर मेहरबान थी। रामपुर में हैदरअली को रक़ीब बनाकर  रामपुर में दाग़ का रहना मुश्किल था।

तीर-ए-नज़र का घायल है

मगर दिल फिर दिल था, वह हिजाब का घायल था। प्रेम ने ज्यादा सताया तो उन्होंने हैदरअली तक अपना पैग़ाम भिजवा दिया। पैग़ाम कुछ इस तरह था-

दाग़ हिजाब के तीर-ए-नज़र का घायल है
आपके दिल बहलाने के और भी सामान हैं
लेकिन दाग़ बेचारा हिजाब को न पाये तो कहां जाये ?
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तीर-ए-नज़र का घायल है

एक वर्ष पहले

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