यूँ फ़ैसला न कर अभी सिक्का उछाल के
पहले जवाब दे मिरे हर इक सवाल के
शीशे ख़रीदने लगे बस्ती के संग-दिल
करनी है आइनों की हिफ़ाज़त सँभाल के
अपनाया जिस को हम ने वो अपना नहीं हुआ
रिश्ता बनाना यार बहुत देख-भाल के
बदनाम एक राज़ बताने से हो गए
होते नहीं हैं दोस्त भी यकसाँ ख़याल के
सपने दिखा के उस ने मिरी नींद छीन ली
ख़ुद सो गया है मुझ को वो मुश्किल में डाल के
जो आसमाँ की चाह में उड़ना न सीख पाए
क़िस्सा गढ़े है उन के ही बेहद कमाल के
मरना तो तय था साँप का इंसाँ को काट कर
रक्खा है ज़हर मुँह में मोहब्बत का पाल के
~ असीम आमगाँवी
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