कौन है ? किसको क़रार है भैया।
सबके दिल में ग़ुबार है भैया ।
अश्रु बनके लहू टपकता है ,
सबके दिल में दरार है भैया ।
पेट पर, पीठ पर अजाने से ,
चाबुकों का प्रहार है भैया ।
नब्ज से कुछ पता नहीं चलता ,
हड्डियों में बुखार है भैया ।
निम्न पहले ही पिसे थे अब तो ,
बीच वालों पे मार है भैया ।
पौन महिने में चुक गया सारा ,
कितना कमती पगार है भैया।
भाव सुरसा का मुँह हुए जाते ,
कितना ऊँचा बज़ार है भैया।
ज़िन्दगी एक है लेकिन उस पर ,
हादसे बेशुमार हैं भैया।
नकद मिलती है यहाँ तकलीफें ,
पर खुशी तो उधार है भैया ।
व्यर्थ है चीख इन सुरंगों में ,
कौन सुनता पुकार है भैया।
कितना बेस्वाद अलोना जीवन ,
उस पे फीका बघार है भैया ।
कल नशे का चढ़ाव था शायद ,
आज उसका उतार है भैया ।
हर बशर करवटें बदलता है ,
क्योंकि दिल बेक़रार है भैया ।
कोई घाटी न शिखर हो जिसमें ,
सबका जीवन पत्थर है भैया ।
लोग लोगों से डर रहे हैं ज्यों ,
पास सबके कटार है भैया।
ऐसा आतंक रोज ही हर पल ,
मौत का इंतजार है भैया ।
आज इंसान कैद है ख़ुद में ,
और खुद से फ़रार है भैया।
आजकल रोज़-रोज़ का मरना ,
ज़िन्दगी में शुमार है भैया।
वास्तविक जितना कुछ विकास हुआ ,
उससे ज़्यादा प्रचार है भैया ।
सबके सीनों में चितायें जलतीं ,
सबकी आँखों में धार है भैया ।
वृक्ष की जड़ से उसकी फुनगी तक ,
भ्रष्टता का प्रसार है भैया ।
जो है कुर्सीनशीन काबिल है ,
जो नहीं है, गंवार है भैया ।
क्रांतियाँ कट भी चुकी, ठूठ बचे ,
भ्रांतियों पर बहार है भैया ।
यार समझे हो तुम जिसे अपना ,
वह तो दुश्मन का यार है भैया ।
अपनी डोली ही लूट लेता है ,
जाने कैसा कहार है भैया ।
ख़ून किस-किससे बचा पाओगे ,
शोषकों की कतार है भैया ।
सबके सीनों में यहां सपनों का ,
टूटा - फूटा मज़ार है भैया ।
जी न लगता है कि खुशियों वाला ,
सबका उजड़ा दयार है भैया ।
पैर राहू ने जकड़ रखे हैं ,
केतु सिर पर सवार है भैया ।
प्यार कहते हैं आजकल जिसको ,
वासना का विकार है भैया ।
लोग तेजी से वृद्ध होते हैं ,
सबको चिंता अपार है भैया ।
जिसका आवा हो समूचा बिगड़ा ,
देश ऐसा कुम्हार है भैया ।
नाव निश्चित ही डूब जायेगी ,
छेद जिसमें हज़ार है भैया ।
बद से बदतर हुई है हालत अब ,
कौन कहता सुधार है भैया ।
आप भी कुछ तो बोलिये आख़िर ,
आपका क्या विचार है भैया ।
- चंद्रसेन विराट
साभार: दिनेश त्रिपाठी शम्स की फेसबुक वाल से
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