राह को जो आसान बना दे वो मंज़िल क्या मंज़िल है
हर मंज़िल से आगे यारो अपने शौक़ का हासिल है
जिस को दर्द का दरमाँ समझा वो भी दर्द भरा दिल है
इतने दर्द पे भी ये दुनिया कितने प्यार के क़ाबिल है
बाहर से आवाज़ ये आए तुम ही मसीहा हो अपने
मेरे अन्दर शोर बपा हो दिल ही अपना क़ातिल है
कुछ मंज़िल पर जा सुसताए कुछ राहों में बैठ गए
कोई किसी का भेद न जाने अपनी अपनी मंज़िल है
हम को इंसाँ और ख़ुदा के फ़र्क़ पे कितनी वहशत थी
देखा तो इस दोराहे पर अपनी ज़ात ही हाएल है
नादानों को दे देती है दुनिया फ़र्ज़ानों का नाम
वो ही दीवाना कहलाए जो भी 'इश्क़ में कामिल है
रंग-ए-मोहब्बत रंग-ए-अबद है फूल हूँ मैं महकार है तू
दाइम क़ाएम रौनक़-ए-हस्ती तेरी मेरी महफ़िल है
तूफ़ानों से डर जाएँ तो साहिल से तूफ़ान उमडें
मौजों को पतवार बना लें तो हर मौज ही साहिल है
मुश्किल को आसान समझ के हम हर 'उक़्दा खोलेंगे
अपनी फ़िक्र 'जमील' करें वो सहल भी जिन को मुश्किल है
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