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जमील मलिक: राह को जो आसान बना दे वो मंज़िल क्या मंज़िल है

jameel malik famous ghazal raah ko jo asaan bana de wo manzil kya manzil hai
                
                                                         
                            


राह को जो आसान बना दे वो मंज़िल क्या मंज़िल है
हर मंज़िल से आगे यारो अपने शौक़ का हासिल है

जिस को दर्द का दरमाँ समझा वो भी दर्द भरा दिल है
इतने दर्द पे भी ये दुनिया कितने प्यार के क़ाबिल है

बाहर से आवाज़ ये आए तुम ही मसीहा हो अपने
मेरे अन्दर शोर बपा हो दिल ही अपना क़ातिल है

कुछ मंज़िल पर जा सुसताए कुछ राहों में बैठ गए
कोई किसी का भेद न जाने अपनी अपनी मंज़िल है

हम को इंसाँ और ख़ुदा के फ़र्क़ पे कितनी वहशत थी
देखा तो इस दोराहे पर अपनी ज़ात ही हाएल है

नादानों को दे देती है दुनिया फ़र्ज़ानों का नाम
वो ही दीवाना कहलाए जो भी 'इश्क़ में कामिल है

रंग-ए-मोहब्बत रंग-ए-अबद है फूल हूँ मैं महकार है तू
दाइम क़ाएम रौनक़-ए-हस्ती तेरी मेरी महफ़िल है

तूफ़ानों से डर जाएँ तो साहिल से तूफ़ान उमडें
मौजों को पतवार बना लें तो हर मौज ही साहिल है

मुश्किल को आसान समझ के हम हर 'उक़्दा खोलेंगे
अपनी फ़िक्र 'जमील' करें वो सहल भी जिन को मुश्किल है 
 

एक दिन पहले

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